एकीकृत चिकित्सा: कैंसर उपचार की समग्र दिशा
मनुष्य केवल शरीर नहीं है, बल्कि पंचकोशीय अस्तित्व है — अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय और आनंदमय। जब इनमें से किसी एक में असंतुलन होता है, तभी रोग जन्म लेता है। कोविड काल ने यह सच्चाई सामने लाई कि स्वास्थ्य केवल दवाओं से नहीं, बल्कि जीवनशैली, प्रतिरक्षा और मानसिक संतुलन से आता है। जब पूरी दुनिया आधुनिक चिकित्सा की सीमाओं में उलझी थी, तब भारत के घरों में काढ़ा, गिलोय, अश्वगंधा, योग और ध्यान ने लाखों लोगों की प्रतिरोधक क्षमता को मजबूत किया। उस दौर ने यह एहसास कराया कि आधुनिक चिकित्सा अपने आप में संपूर्ण नहीं है।
कैंसर इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। भारत के कैंसर रजिस्ट्रियों के अनुसार 2024 में 15.6 लाख नए कैंसर मामले दर्ज किए गए। पुरुषों में मुख (ओरल कैंसर) अब फेफड़ों के कैंसर से भी आगे निकल चुका है, जबकि महिलाओं में स्तन कैंसर में उल्लेखनीय वृद्धि देखी गई। ICMR की रिपोर्ट बताती है कि भारत में हर पाँच में से तीन कैंसर रोगी निदान के बाद जीवन नहीं बचा पाते। वहीं WHO की फरवरी 2025 की रिपोर्ट के अनुसार, भारत में हर 20 में से एक महिला स्तन कैंसर के उच्च जोखिम में है। तम्बाकू सेवन में कमी के बावजूद ओरल कैंसर के मामले कम नहीं हुए हैं, जिनका मुख्य कारण तम्बाकू के दीर्घकालिक प्रभाव, शराब का सेवन और अस्वस्थ जीवनशैली है। आधुनिक चिकित्सा मानती है कि केवल 5–10% कैंसर आनुवंशिक होते हैं, जबकि अधिकांश जीवनशैली, आहार, पर्यावरणीय प्रदूषण और मानसिक तनाव से जुड़े हैं। साथ ही प्रोस्टेट कैंसर (पुरुषों में) और गर्भाशय/एंडोमेट्रियल कैंसर (महिलाओं में) भी बढ़ रहे हैं, जिनका संबंध मोटापा, हार्मोनल असंतुलन और निष्क्रिय जीवनशैली से है।
भारत में कैंसर की सबसे अधिक घटनाएँ पूर्वोत्तर क्षेत्र, विशेष रूप से मिज़ोरम में दर्ज की गईं, जहाँ पुरुषों में 21.1% और महिलाओं में 18.9% आजीवन कैंसर जोखिम पाया गया। इसके पीछे प्रमुख कारण हैं — अधिक तम्बाकू सेवन, किण्वित सूअर की चर्बी, धुएँ में पका मांस, अत्यधिक मसालेदार भोजन, गरम पेय और कार्सिनोजेनिक संक्रमणों जैसे HPV, Helicobacter pylori और हेपेटाइटिस वायरस की अधिकता। भारत में कुल कैंसर मामलों में से लगभग 4% बच्चे (0–14 वर्ष) प्रभावित होते हैं। इन आँकड़ों से स्पष्ट है कि कैंसर केवल रोग नहीं, बल्कि जीवनशैली, पर्यावरण और मानसिक असंतुलन का परिणाम है, जहाँ आयुर्वेदिक दृष्टिकोण आवश्यक है।
बीमारी होने के साथ ही कैंसर एक महँगा सौदा बन चुका है। भारत में ऑन्कोलॉजी दवाओं का बाजार करीब 15% वार्षिक दर से बढ़ रहा है। नई टार्गेटेड और इम्यूनोथेरेपी दवाएँ लाखों रुपये की हैं, जिससे एक औसत परिवार को इलाज पर 80 हजार से 1 लाख रुपये तक खर्च करने पड़ते हैं। कई लोग गरीबी की रेखा के नीचे चले जाते हैं, जबकि दवा कंपनियाँ इस भय से लाभ उठाती हैं।

मगर कुछ उदाहरण इस सोच को बदलते हैं, जैसे अमृतसर की डॉ. नवजोत कौर सिद्धू, जिनके पति नवजोत सिंह सिद्धू ने 2023 में बताया कि सख्त आहार और जीवनशैली बदलाव सख्त आहार और जीवनशैली बदलाव के साथ आधुनिक उपचार ने उन्हें कैंसर-फ्री बनाया। उन्होंने लिखा — “Treatment + Diet – great combination for cancer cure.” उनकी पत्नी ने नींबू पानी, हल्दी, एप्पल साइडर विनेगर, अखरोट, चुकंदर-गाजर-आंवले का रस, नीम की पत्तियाँ और pH-7 वाला जल लिया। उन्होंने शुगर, गेहूँ और डेयरी प्रोडक्ट्स पूरी तरह बंद कर दिए।
यह डाइट भारतीय आयुर्वेद और नोबेल पुरस्कार विजेता योशिनोरी ओसुमी की Autophagy पर आधारित खोज से प्रेरित थी — जिसमें शरीर की कोशिकाएँ स्वयं को साफ़ कर पुनर्जीवित करती हैं। यह उदाहरण दर्शाता है कि आधुनिक उपचार और परंपरागत ज्ञान (CAM – Complementary and Alternative Medicine) साथ मिलकर बेहतर परिणाम दे सकते हैं। CAM में आयुर्वेद, योग, प्राकृतिक चिकित्सा, यूनानी, सिद्ध और होम्योपैथी जैसी प्रणालियाँ शामिल हैं, जो अब विज्ञान की पूरक शक्ति बन चुकी हैं। आयुर्वेद के अनुसार जब वात, पित्त और कफ असंतुलित होते हैं, तब रोग उत्पन्न होता है, और उनका संतुलन ही स्वास्थ्य का मूल आधार है। कैंसर, जिसे आयुर्वेद “अर्बुद” कहता है, कोशिकाओं की असामान्य वृद्धि और असंतुलन का परिणाम है। इसका उपचार केवल दवाओं से नहीं, बल्कि आहार, मानसिक शांति और संतुलित जीवनचर्या से संभव है। आयुर्वेदिक में रसयान चिकित्सा (Rejuvenation Therapy) शरीर का संतुलन पुनः स्थापित कर प्रतिरक्षा शक्ति को पुनर्जीवित करती है।
भारत का स्वास्थ्य तंत्र दो धाराओं पर आधारित है — एक ओर आधुनिक संस्थान जैसे AIIMS, टाटा मेमोरियल, दूसरी ओर आयुर्वेद, योग, प्राकृतिक चिकित्सा और होम्योपैथी के हजारों केंद्र। शहरी क्षेत्रों में सुविधाएँ बेहतर हैं, जबकि ग्रामीण भारत सीमित संसाधनों से जूझ रहा है, जिससे “एकीकृत चिकित्सा प्रणाली” की आवश्यकता और स्पष्ट होती है। भारत सरकार का आयुष मंत्रालय (Ministry of AYUSH) और ICMR मिलकर पारंपरिक व आधुनिक चिकित्सा के संयोजन पर वैज्ञानिक परीक्षण कर रहे हैं। यह वही दिशा है जिसकी सिफारिश WHO ने अपनी Traditional Medicine Strategy (2014–2023) में की थी।
सबसे बड़ा लाभ यह है कि आधुनिक चिकित्सा जहाँ रोग का इलाज करती है, वहीं आयुर्वेदिक और योगिक जीवनशैली बीमारी को होने से रोकती है और यदि हो भी जाए तो उसके मूल कारण को दूर कर शरीर का संतुलन बहाल करती है। असंतुलित आहार, तनाव, नींद की कमी और प्रदूषण शरीर में “अम” यानी विषाक्तता उत्पन्न करते हैं। हल्दी, त्रिफला, तुलसी, गिलोय और नीम जैसे औषधीय तत्व शरीर को विषमुक्त कर आत्म-चिकित्सा (self-healing) की शक्ति देते हैं। नेचुरोपैथी — उपवास, हाइड्रोथेरेपी और आहार-सुधार — प्रतिरक्षा प्रणाली को सशक्त करती है, जबकि होम्योपैथी एलर्जी, माइग्रेन और मनोदैहिक रोगों में प्रभावी है। आज की बीमारियाँ — डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर, मोटापा, अवसाद — असंतुलित जीवनशैली और मानसिक असंतुलन का परिणाम हैं। यही कारण है कि इंटीग्रेटिव मेडिसिन आज स्वास्थ्य-संवर्धन का आदर्श मॉडल बनकर उभर रही है। एकीकृत चिकित्सा का मूल सिद्धांत “Whole Person Healing” है — यानी रोग नहीं, व्यक्ति का उपचार। यह शरीर, मन और आत्मा — तीनों स्तरों पर कार्य करती है। यह प्रणाली कम लागत, न्यूनतम दुष्प्रभाव और “One Health Approach” के साथ मानव, पशु और पर्यावरण — तीनों के स्वास्थ्य को जोड़ती है, जिससे यह सचमुच एक समग्र चिकित्सा दृष्टिकोण बनती है।
कैंसर उपचार में केवल दवाएँ नहीं, बल्कि रोगी का मनोबल, प्रतिरक्षा शक्ति और मानसिक संतुलन भी उतने ही आवश्यक हैं। कीमोथेरपी और रेडिएशन के दौरान रोगी शारीरिक दर्द, बाल झड़ने और मृत्यु के भय से जूझता है, जिससे आत्मविश्वास कमजोर होता है। परिवारजन भी तनाव और अवसाद से गुजरते हैं। ऐसे में योग और ध्यान प्रभावी औषधि की तरह कार्य करते हैं — ये तनाव घटाते, नींद सुधारते और प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाते हैं। भारत में टाटा मेमोरियल और ICMR–AYUSH केंद्रों में इंटीग्रेटेड ऑन्कोलॉजी मॉडल पर कार्य हो रहा है। AYUSH उद्योग भी 2022–2027 के बीच 8.6% वार्षिक वृद्धि दर से बढ़ रहा है, जिससे भारत “स्वास्थ्य दर्शन” का वैश्विक केंद्र बन सकता है।
एकीकृत चिकित्सा का मूल सिद्धांत यह है कि आधुनिक चिकित्सा तीव्र परिस्थितियों में जीवन बचाने में सक्षम है, परंतु दीर्घकालिक स्वास्थ्य के लिए संतुलित जीवनशैली, पौष्टिक आहार और मानसिक स्थिरता आवश्यक हैं। स्वास्थ्य केवल दवाओं से नहीं, बल्कि जीवन के समग्र संतुलन से आता है। इसी कारण आज विश्व के प्रमुख संस्थान — हार्वर्ड मेडिकल स्कूल, मेयो क्लिनिक और NCCIH (अमेरिका) — इंटीग्रेटिव मेडिसिन पर शोध कर रहे हैं। भारत के लिए यह दिशा और भी स्वाभाविक है, क्योंकि यहाँ आयुर्वेद और आधुनिक चिकित्सा दोनों की गहरी परंपरा और वैज्ञानिक नींव मौजूद है। अब आवश्यकता है कि चिकित्सा को व्यवसाय नहीं, सेवा का स्वरूप दिया जाए, ताकि इलाज सस्ता, सुलभ और अधिक मानवीय बन सके।
एकीकृत चिकित्सा परंपरा और विज्ञान का संतुलन है, न कि “मिक्सोपैथी”। इसका उद्देश्य मिश्रण नहीं, बल्कि वैज्ञानिक समन्वय (synergy) है। यह औषधीय एकाधिकार (allopathic monopoly) को चुनौती देती है और स्थानीय, सस्ते, समुदाय-आधारित स्वास्थ्य मॉडल को प्रोत्साहन देती है। हालांकि, इसके समक्ष औषधियों का मानकीकरण, दोहरी प्रशिक्षण प्राप्त चिकित्सकों की कमी और फार्मा लॉबी का दबाव जैसी चुनौतियाँ हैं, जिन्हें नीति, शिक्षा और शोध के माध्यम से संबोधित करना होगा। एकीकृत चिकित्सा में चिकित्सक–रोगी संबंध का अर्थ भी बदल जाता है। डॉक्टर केवल दवा देने वाला नहीं, बल्कि उपचार यात्रा का सहयात्री बन जाता है, और रोगी अपने स्वास्थ्य का सक्रिय भागीदार।
एकीकृत चिकित्सा (इंटीग्रेटिव मेडिसिन) न तो परंपरा की वापसी है और न आधुनिकता का विरोध — बल्कि एक संतुलित पुनर्स्थापना है, जो विज्ञान को संवेदना से, प्रौद्योगिकी को परंपरा से और ज्ञान को करुणा से जोड़ती है। भारत, जहाँ चरक और सुश्रुत की विरासत आधुनिक शोध संस्थानों के साथ जीवित है, विश्व को एक ऐसा स्वास्थ्य मॉडल दे सकता है जो वैज्ञानिक, मानवीय और सतत हो। इसका उद्देश्य केवल “जीवन में वर्षों को जोड़ना” नहीं, बल्कि “वर्षों में जीवन जोड़ना” है — क्योंकि मनुष्य केवल शरीर नहीं, चेतना भी है, और जब उपचार शरीर, मन और आत्मा — तीनों स्तरों पर होता है, तभी वह सच्चा उपचार कहलाता है। आखिरकार, स्वास्थ्य का लक्ष्य केवल रोग से मुक्ति नहीं, बल्कि वह होना चाहिए जो आयुर्वेद सदियों से कहता आया है —
“स्वस्थस्य स्वास्थ्य रक्षणं, आतुरस्य विकार प्रशमनं।”
अर्थात्, स्वस्थ व्यक्ति के स्वास्थ्य की रक्षा और रोगी के रोग का निवारण ही सच्ची चिकित्सा है।


