शेख हसीना को मौत की सजा: बांग्लादेश में इस्लामी राजनीति का नया गठजोड़
बांग्लादेश एक खतरनाक मोड़ पर खड़ा है। 1971 के बाद पहली बार देश राजनीतिक, संस्थागत और सभ्यतागत स्तर पर पूर्ण पतन की वास्तविक संभावना का सामना कर रहा है। पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना को सुनाई गई मौत की सजा कोई कानूनी फैसला नहीं है, बल्कि एक शत्रुतापूर्ण सत्ता-हथियाने की आधिकारिक घोषणा है। यह अब तक का सबसे स्पष्ट प्रमाण है कि इस्लामिक ताक़तों, विदेशी खुफिया एजेंसियों और अवसरवादी राजनीतिक समूहों का एक गठबंधन देश की बागडोर अपने हाथ में ले चुका है,— और अब वह बांग्लादेश की धर्मनिरपेक्ष पहचान को एक-एक ईंट करके तोड़ रहा है।
जो कुछ हो रहा है, वह कोई न्यायिक प्रक्रिया नहीं है, यह एक राजनीतिक सफ़ाए का अंतिम चरण है, जिसका उद्देश्य धर्मनिरपेक्ष राष्ट्रवाद को मिटाकर उसकी जगह एक मजहबी व्यवस्था स्थापित करना है।
एक ऐसा मुकदमा जिसने अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन किया
ग़ैरहाज़िरी में शेख हसीना का मुकदमा चलाना, अंतरराष्ट्रीय नागरिक और राजनीतिक अधिकारों के अनुबंध (ICCPR) में निहित प्राकृतिक न्याय के हर सिद्धांत का उल्लंघन करता है। ICCPR के अनुच्छेद 14 में स्पष्ट रूप से यह गारंटी दी गई है कि किसी भी अभियुक्त को स्वयं उपस्थित रहने, गवाही सुनने और सबूतों को चुनौती देने का अधिकार है। संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार समिति ने बार-बार यह दोहराया है कि इन अधिकारों के बिना निष्पक्ष मुकदमा संभव नहीं है।
हसीना के मामले में, इनमें से कोई भी अधिकार नहीं दिया गया। अंतरराष्ट्रीय अपराध न्यायाधिकरण की विश्वसनीयता पहले ही सवालों के घेरे में थी, लेकिन यह फैसला राजनीतिक हथियारबंदी की एक अभूतपूर्व गिरावट का प्रतीक है। यह मुकदमा कोई न्यायिक प्रक्रिया नहीं था, यह एक सुविधा थी, एक औजार था, और अंततः एक संदेश था।
यूनुस शासन का एजेंडा: धर्मनिरपेक्ष बांग्लादेश का मिटाया जाना
मुहम्मद यूनुस, जिन्हें कभी सामाजिक उद्यमिता के प्रतीक के रूप में विश्वभर में सराहा गया था, अब स्वतंत्रता के बाद से बांग्लादेश के सबसे प्रतिगामी राजनीतिक पुनर्संरचना के प्रमुख हैं। उनकी अनिर्वाचित सरकार, जो शक्तिशाली राजनीतिक साझेदारों, बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP), जमात-ए-इस्लामी, हिज्ब-उत-तहरीर (HuT), हिफाज़त-ए-इस्लाम (HeI), और “फँसे हुए पाकिस्तानी” कट्टरपंथी समूहों, के सहारे टिकी है, ने व्यवस्थित रूप से देश की संस्थागत मेरुदंड को निशाना बनाया है।
शेख हसीना को दी गई मौत की सजा उनके व्यापक अभियान, राज्य के इस्लामीकरण और 1971 की मुक्ति की विचारधारा के उलटाव, की सबसे स्पष्ट जीत है।
जमात-ए-इस्लामी के लिए यह फैसला न्याय नहीं, प्रतिशोध है। हिज्ब-उत-तहरीर के लिए यह एक रणनीतिक विजय है। और पाकिस्तान की आईएसआई के लिए यह उस राजनीतिक व्यवस्था की बहाली है जिसे 1971 ने उनसे छीन लिया था। अंतरराष्ट्रीय पर्यवेक्षक इसे जैसा है वैसा ही देख रहे हैं , कानूनी प्रक्रिया के नाम पर की गई एक राजनीतिक हत्या।
इतिहास पर सुनियोजित हमला
जिस दिन मौत का फैसला सुनाया गया, उसी दिन ढाका में एक भयावह दृश्य देखा गया। जमात के कार्यकर्ता, हिज्ब-उत-तहरीर के सदस्य और “फँसे हुए पाकिस्तानी” समुदाय के कट्टरपंथी लोग एकजुट होकर बंगबंधु शेख मुजीबुर रहमान के ध्वस्त धानमंडी आवास की ओर बढ़े। उनका उद्देश्य साफ था, बांग्लादेश के धर्मनिरपेक्ष राष्ट्रवाद के प्रतीक स्थल पर कब्जा करना और उसे एक “खेल का मैदान” घोषित करना। यह कदम स्वतःस्फूर्त नहीं था। यह रणनीतिक था। इसका उद्देश्य 1971 की विरासत का अपमान करना, बंगबंधु की स्मृति को मिटाना, और पूरे देश को यह संदेश देना था कि पुराना युग समाप्त हो चुका है। केवल पुलिस और सेना के संयुक्त हस्तक्षेप ने इस अपवित्रता को रोकने में सफलता पाई।
न्यायाधिकरण: एक राजनीतिक हथियार, न्यायालय नहीं
अटलांटिक काउंसिल के माइकल कुगेलमैन ने उल्लेख किया है कि यह फैसला न्याय के बजाय राजनीतिक अविश्वास के दृष्टिकोण से देखा जा रहा है। अंतरराष्ट्रीय अपराध न्यायाधिकरण अब एक न्यायिक मंच नहीं, बल्कि एक राजनीतिक औज़ार बन चुका है। इसका वर्तमान कार्य स्पष्ट है, विरोधियों को समाप्त करना, संस्थानों को भयभीत करना, और सत्तारूढ़ गठबंधन के एजेंडे को वैधता प्रदान करना। इस बार न्यायाधिकरण ने ठीक वही परिणाम दिया जिसकी जमात और उसके विदेशी सहयोगियों को चाह थी, उस महिला को हटाना जिसने उनके आतंकी ढांचे को तोड़ा और उनकी राजनीतिक बढ़त को रोक दिया।
भारत एक रणनीतिक जाल में फँसा हुआ
यूनुस शासन ने तुरंत भारत से शेख हसीना को प्रत्यर्पित करने की मांग की। यह अनुरोध मात्र राजनीतिक दबाव नहीं है, यह एक सावधानीपूर्वक रचा गया जाल है।
अब भारत एक त्रिस्तरीय दुविधा का सामना कर रहा है:
-
यदि प्रत्यर्पण से इंकार करता है, तो ढाका में इस्लामिक ताकतों से नियंत्रित शत्रुतापूर्ण शासन के साथ तनाव बढ़ेगा।
-
यदि प्रत्यर्पण स्वीकार करता है, तो वह एक ऐतिहासिक सहयोगी के साथ विश्वासघात करेगा, जिसने आतंकवाद-निरोधी सहयोग में अतुलनीय योगदान दिया था।
-
और यदि शेख हसीना को किसी “तीसरे देश” भेजने का प्रयास होता है, तो उसके सफल होने की संभावना नगण्य है।
रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार, भारत ने कार्रवाई से पहले सभी न्यायाधिकरण दस्तावेज़ों की समीक्षा करने की बात कही है, यह ध्यान दिलाते हुए कि मामला राजनीतिक उद्देश्यों से प्रेरित प्रतीत होता है, जो भारत-बांग्लादेश प्रत्यर्पण संधि के तहत एक वैध अपवाद है।
यह दुविधा गहरी है: यदि नई दिल्ली ने कोई भी रणनीतिक भूल की, तो वह अपने पूर्वी सीमा पर ईरान-शैली की मजहबी व्यवस्था के उदय के साथ जाग सकती है।
मानवाधिकार संगठनों ने फैसले को खारिज किया
एमनेस्टी इंटरनेशनल की महासचिव एग्नेस कैलामार्ड ने इस फैसले की स्पष्ट रूप से निंदा की, इसे “न तो न्यायसंगत और न ही उचित” बताते हुए कहा कि मौत की सजा “मानवाधिकारों के उल्लंघन को और गहरा करती है।” उनके ये शब्द एक बड़ी सच्चाई को उजागर करते हैं। यह मुकदमा कभी न्याय देने के लिए नहीं था; इसका उद्देश्य तो राज्य प्रायोजित राजनीतिक विलोपन का औज़ार बनना।
इस बीच, यूनुस शासन का कहना है कि सामान्य चुनाव फरवरी 2026 में कराए जाएंगे। लेकिन कुछ ही गंभीर विश्लेषक इस वादे पर विश्वास करते हैं। लगातार यह धारणा मज़बूत हो रही है कि यूनुस, जिन्हें पाकिस्तान, तुर्की, यूरोपीय संघ के कुछ हिस्सों और अमेरिकी प्रतिष्ठान के कुछ वर्गों का समर्थन प्राप्त है, अनिश्चितकाल तक सत्ता में बने रहने की योजना बना रहे हैं। धर्मनिरपेक्ष और वामपंथी पार्टियों को चुनाव में भाग लेने से रोकना इसी योजना का हिस्सा है।
चुनाव की समय-सारिणी दरअसल एक धोखेबाज़ परदा है, एक राजनयिक संकेत, जिसका मकसद केवल समय खरीदना है ताकि शासन अपनी पकड़ और मज़बूत कर सके।
मेरे विचार में, दिसंबर का महीना यूनुस शासन को एक संवैधानिक संकट की ओर धकेलेगा, उसे या तो चुनाव-समय की प्रशासनिक संरचना अपनानी होगी और अपनी सलाहकार परिषद का आकार घटाना होगा, या फिर राजनीतिक अस्थिरता का सामना करना पड़ेगा। यदि उसने इनकार किया, तो निश्चित रूप से अशांति बढ़ेगी, ख़ासकर बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी की ओर से, जो सड़कों पर उतरकर चुनावोत्तर सत्ता में हिस्सेदारी की माँग करेगी। एक ऐसा शासन जो पहले से ही विदेशी खुफिया तंत्र के सहयोग और इस्लामी लामबंदी पर निर्भर है, वह इस स्थिति का जवाब और अधिक दमन के रूप में दे सकता है।
बांग्लादेश एक ख़तरनाक दौर में प्रवेश कर चुका है।
शेख हसीना को दी गई मौत की सजा किसी युग का अंत नहीं, बल्कि एक नए और और भी अंधकारमय युग की शुरुआत है।
(मूल अंग्रेजी से अनुवादित)


